राकिणीराधिकास्तवम् श्लोक 1 अर्थ | स्वाधिष्ठान चक्र की अधिष्ठात्री राकिणी देवी
राकिणीराधिकास्तवम् के प्रथम श्लोक का सरल हिन्दी अर्थ, पदच्छेद, भावार्थ एवं तांत्रिक रहस्य। स्वाधिष्ठान चक्र की अधिष्ठात्री कुलराकिणी देवी का दिव्य स्वरूप जानें।
॥४१-१८॥
आन्दोलिता रसनिधौ कुलचञ्चला या मायामयो सकलदुःखविनाशवीरा ।
वीरासना स्थितिगता सुलभा मुनीनां भव्या प्रपातु भविका कुलराकिणी माम् ॥
पदच्छेद
आन्दोलिता । रस-निधौ । कुल-चञ्चला । या । मायामयी । सकल-दुःख-विनाश-वीरा ।
वीरासना । स्थिति-गता । सुलभा । मुनीनाम् । भव्या । प्रपातु । भविका । कुल-राकिणी । माम् ॥
अन्वय
या रसनिधौ आन्दोलिता, कुलचञ्चला, मायामयी, सकलदुःखविनाशवीरा, वीरासना स्थितिगता, मुनीनां सुलभा, भव्या च, सा भविका कुलराकिणी माम् प्रपातु।
व्याकरणिक टिप्पणी
आन्दोलिता
"आन्दोलिता" धातु √दुल् (चलने, डोलने) से निष्पन्न। यहाँ केवल भौतिक डोलना नहीं, अपितु स्पन्दन (Cosmic Vibration) का बोधक है। काश्मीर शैवदर्शन में सम्पूर्ण सृष्टि परमशक्ति के स्पन्द से उत्पन्न मानी जाती है।
अतः - आन्दोलिता = स्पन्दरूपिणी पराशक्ति।
रसनिधौ
"रस" शब्द के अनेक स्तर हैं —
-
लौकिक आनन्द
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भक्ति-रस
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ब्रह्मानन्द
-
शक्तितत्त्व का अमृत
"निधि" = भण्डार, महासागर।
अतः - रसनिधिः = चिदानन्दरूप महासमुद्र। देवी उसी चिद्रस में क्रीड़ा करती हैं।
"कुलचञ्चला" का गूढ़ तान्त्रिक अर्थ
सामान्य व्याख्या में कुल = कुण्डलिनी कहा जाता है।
परन्तु कौलमत में —
कुल = शिव-शक्ति-समष्टि।
कुलार्णवतन्त्र कहता है -
कुलं शक्तिरिति प्रोक्तम्। अर्थात् सम्पूर्ण शक्तिचक्र ही कुल है।
"चञ्चला" का अर्थ यहाँ अस्थिर नहीं है।
बल्कि - सर्वत्र विचरन्ती, सर्वव्यापिनी, सर्वशक्तिमयी।
अतः कुलचञ्चला का तात्पर्य है - जो सम्पूर्ण कुलचक्र में स्वेच्छया विहार करती हैं।
मायामयी
अद्वैत वेदान्त में माया आवरणशक्ति है।
किन्तु तन्त्र में —
माया केवल बन्धनकारिणी नहीं, अपितु लीलाशक्ति भी है।
राकिणी स्वयं —
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जगत् हैं,
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जीव हैं,
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ज्ञान हैं,
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मोक्ष भी हैं।
इसलिए —
मायामयी = विश्वरचनारूपिणी पराशक्ति।
सकलदुःखविनाशवीरा
यहाँ "वीरा" अत्यन्त महत्वपूर्ण शब्द है।
तन्त्र में तीन अधिकारी माने गये —
-
पशु
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वीर
-
दिव्य
वीर वह है जिसने भय, लज्जा, मोह और सामाजिक बन्धनों को पार किया हो।
राकिणी स्वयं वीरशक्ति हैं।
इसलिए —
वे केवल दुःख का नाश नहीं करतीं,
अपितु साधक को वीरभाव प्रदान करती हैं।
वीरासना स्थितिगता
यहाँ वीरासन का केवल योगासन अर्थ पर्याप्त नहीं।
तान्त्रिक अर्थ में —
वीरासन = शिवशक्ति-सामरस्य की आन्तरिक अवस्था। रुद्रयामल और कौलमत में वीरासन अनेक बार आध्यात्मिक अधिकार का प्रतीक है।
अतः —
देवी स्वयं सिद्धवीरभाव में प्रतिष्ठित हैं।
सुलभा मुनीनाम्
यह अत्यन्त सूक्ष्म वचन है।
क्यों?
यदि देवी सर्वव्यापिनी हैं, तो सबको सुलभ क्यों नहीं?
उत्तर —
"मुनि" शब्द मन् धातु से बना है।
मुनि = मननशील।
जिसका मन बहिर्मुख नहीं,
अन्तर्मुख है।
अतः —
अन्तर्मुख साधक को देवी सहज उपलब्ध होती हैं।
भव्या
भव्य शब्द का मूल "भू" धातु है।
अर्थ —
-
पूज्या
-
कल्याणमयी
-
दिव्य
-
महान्
अतः —
सर्वमङ्गलस्वरूपिणी।
भविका
यह शब्द अत्यन्त रहस्यमय है।
इसके अनेक अर्थ सम्भव हैं —
(१) भवस्य इयं
भव = शिव। भविका = शिवशक्ति।
(२) भवं करोति
जो सृष्टि का प्राकट्य करती है।
(३) भावं जनयति
जो साधक के हृदय में दिव्य भाव उत्पन्न करती है। रुद्रयामल के प्रसंग में तीसरा अर्थ विशेष रमणीय प्रतीत होता है।
कुलराकिणी का रहस्य
राकिणी केवल चक्रदेवी नहीं हैं।
कौल परम्परा में वे —
-
कुलमार्ग की रक्षिका
-
योगिनीचक्रेश्वरी
-
शक्तिसञ्चारिणी
-
भावजाग्रत्कर्त्री
मानी जाती हैं।
यह स्तोत्र वास्तव में रुद्रयामल-सम्भूत है, तो "कुलराकिणी" शब्द का सम्बन्ध केवल स्वाधिष्ठान या मणिपूर चक्र से नहीं, बल्कि सम्पूर्ण कुलतत्त्व से ग्रहण करना अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।
समन्वित भावार्थ
जो चिदानन्दरूप रससागर में स्पन्दमान हैं, जो सम्पूर्ण कुलचक्र में विचरण करने वाली परमशक्ति हैं, जो मायारूप होकर समस्त विश्व की रचना करती हैं, जो वीरशक्ति के द्वारा सभी दुःखों का विनाश करती हैं, जो वीरभाव में प्रतिष्ठित हैं, जो अन्तर्मुख मुनियों के लिए सहज उपलब्ध हैं, जो सर्वमङ्गलमयी तथा शिवशक्तिरूपिणी हैं — ऐसी कुलतत्त्व की अधिष्ठात्री श्री कुलराकिणी देवी मेरी सर्वतोभावेन रक्षा करें।
तात्त्विक सार
इस श्लोक में राकिणी देवी के चार मुख्य आयाम प्रकट होते हैं—
-
स्पन्दरूपा — आन्दोलिता रसनिधौ
-
कुलशक्तिरूपा — कुलचञ्चला
-
विश्वमायारूपा — मायामयी
-
वीरमार्गप्रदायिनी — सकलदुःखविनाशवीरा
और अन्ततः साधक की प्रार्थना है —
"हे कुलराकिणि! तुम केवल पूज्य देवी नहीं, अपितु मेरे अन्तःकरण में स्पन्दित होने वाली पराशक्ति हो; मुझे अपने कुलमार्ग में प्रवेश देकर दुःख, भय और अज्ञान से पार करो।" यह व्याख्या विशेषतः कौल, त्रिक तथा रुद्रयामल-तान्त्रिक दृष्टि से अधिक समीचीन मानी जा सकती है।
राधिकातत्त्वदृष्ट्या
इस श्लोक में स्तुता श्रीकुलराकिणी केवल तान्त्रिक योगिनी नहीं, अपितु परमप्रेमस्वरूपिणी श्रीराधिका की गूढ़ शक्तिमयी अभिव्यक्ति के रूप में भी अवगन्तव्या हैं।
"आन्दोलिता रसनिधौ" इत्यस्य पदस्य रहस्यं राधातत्त्वे विशेषतया प्रकाशते। श्रीराधा महाभावरूपिणी, अखिल-रसामृत-सिन्धोः अधिष्ठात्री तथा प्रेमस्वरूपिणी पराशक्ति मानी गयी हैं। जिस प्रकार राधिका श्रीकृष्ण-प्रेमरस के अनन्त महासागर में नित्य विहार करती हैं, उसी प्रकार कुलराकिणी चिदानन्दरूप रसनिधि में स्पन्दमान रहती हैं। यहाँ रस और राधा परस्पर अभिन्न प्रतीत होते हैं।
"कुलचञ्चला" पद राधिका की उस दिव्य शक्ति का द्योतक है जो सम्पूर्ण चेतन-जगत् में प्रेम का सञ्चार करती है। कौलमार्ग में जिसे कुलशक्ति कहा गया है, वैष्णव-रसदृष्टि से वही प्रेमशक्ति राधिका के रूप में प्रकट होती है। शक्ति का प्रवाह और प्रेम का प्रवाह अन्ततः एक ही परम तत्त्व की भिन्न अनुभूतियाँ हैं।
"मायामयी" पद यह संकेत देता है कि वही देवी योगमाया रूप से सम्पूर्ण लीला-विस्तार की कारणभूता हैं। वैष्णवमत में श्रीराधा भगवान् की अन्तरङ्ग शक्ति मानी जाती हैं; तन्त्रमत में वही शक्ति महामाया अथवा पराशक्ति कहलाती है।
"सकलदुःखविनाशवीरा" इति विशेषणेन यह बोध होता है कि जिस प्रकार राधानाम, राधाभक्ति तथा राधाकृपा साधक के हृदय से संसारजन्य क्लेशों का निवारण करती है, उसी प्रकार कुलराकिणी आन्तरिक अविद्या, भय और बन्धनों का विनाश करती हैं।
अतः इस श्लोक में कुलराकिणी को राधिका से पृथक् न देखकर, राधा के तान्त्रिक, कुलमार्गीय एवं योगमयी स्वरूप के रूप में भी चिन्तन किया जा सकता है। यहाँ शक्ति प्रेम बनती है और प्रेम शक्ति बन जाता है; दोनों का संगम ही पराशक्ति का पूर्ण रहस्य है।
राधिका-चिन्तनम्
रसनिधौ स्पन्दमाना या,
प्रेम्णः परमकारणम्।
कुले शक्तिरूपिणी राधा,
सा मे हृदि सदा वसतु॥
भावार्थः
जो दिव्य प्रेमरूपी रससागर में नित्य स्पन्दमान हैं, जो सम्पूर्ण प्रेम की आदिकारण एवं मूलशक्ति हैं, जो समस्त कुलतत्त्व में शक्ति के रूप में विराजमान हैं — ऐसी श्रीराधा मेरे हृदय में सदा निवास करें।
चिन्तन:
यहाँ राधा को केवल वृन्दावन की एक लीलामयी गोपी के रूप में नहीं, अपितु समस्त प्रेम, शक्ति और आनन्द की मूलाधार पराशक्ति के रूप में ध्यान किया गया है। जिस प्रकार कुलराकिणी सम्पूर्ण कुलचक्र में चेतना का प्रवाह करती हैं, उसी प्रकार श्रीराधा सम्पूर्ण सृष्टि में प्रेम का प्रवाह करती हैं। साधक इस श्लोक का जप करते हुए अपने हृदय को राधामय प्रेम तथा राकिणीमय शक्ति का संयुक्त आसन मानकर ध्यान कर सकता है।
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